BhaktiVed
కృష్ణుడు

मनजी ! मुसाफर रे ! चलो निज देश भणी !

భజనరచన: દયારામ (Dayaram)

मनजी ! मुसाफर रे ! चलो निज देश भणी !

मनजी ! मुसाफर रे ! चलो निज देश भणी !

मूलक घणा जोया रे ! मुसाफरी थई छे घणी !

स्वपुर जवानो पंथ आव्यो छे, रखे भूलता भाई !

फरीने मारग मळवो छे नहीं, एवी तो छे अवळाई,

समझीने चालो सूधा रे ! ना जाशो डाबा के जमणी. मनजी !

वच्चे फांसीआ वाट मारवाने बेठा छे बे चार,

माटे, वळवा राखो बेत्रणेक त्यारे तेनो नहीं भार,

मळ्यो छे एक भेदु रे ! बतावी गति सहु ते तणी. मनजी !

माल वहोरो तो वहोरो शेठना नामनो, थाय ना क्यहुं अटकाव,

आपणो करतां जोखम आवे ने फावे दाणीनो दाव,

एटला सारुं रे ! ना थावुं वहोतरना धणी. मनजी !

जोजो, जगतथकी जावुं छे, करजो संभाळीने काम,

दास दयाने एम गमे छे – हांवा जईए पोताने धाम,

सूझे छे हांवा एवुं रे ! अवध थई छे आपणी ! मनजी !

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