BhaktiVed
ॐ

मेरु तो डगे जेनां मन ना डगे

భజనరచన: ગંગાસતી (Gangasati)

मेरु तो डगे जेनां मन ना डगे

मेरु तो डगे जेनां मन नव डगे, पानबाई

मरने भांगी पडे ब्रह्मांडजी;

विपत्ति पडे तोय वणसे नहीं;

सोई हरिजननां प्रमाणजी.

चित्तनी वृति जेनी सदा रहे निर्मळी,

ने करे नहीं कोईनी आशजी;

दान देवे पण रहे अजाची,

राखे वचनमां विश्वास जी – मेरु.

हरख ने शोकनी आवे नही हेडकी,

आठे पहोर रहे आनंदजी,

नित्य रहे सत्संगमां ने

तोडे माया केरा फंदजी – मेरु.

तन मन धन जेणे गुरुने अर्प्यां,

तेनुं नाम निजारी नर ने नारजी,

एकांते बेसीने अलख आराधे तो,

अलख पधारे एने द्वारजी – मेरु.

सतगुरु वचनमां शूरा थई चाले,

शीश तो कर्यां कुरबान रे,

संकल्प विकल्प एके नहि उरमां,

जेणे मेल्यां अंतरनां मान रे – मेरु.

संगत करो तो एवानी करजो,

जे भजनमां रहे भरपुरजी,

गंगा सती एम बोलियां, पानबाई

जेनां नेणोमां वरसे झाझां नूरजी – मेरु.

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