BhaktiVed
కృష్ణుడు

समरने श्री हरि

garbaరచన: નરસિંહ મહેતા (Narsinh Mehta)

समरने श्री हरि, मेल्य ममता परी, जोने विचारीने मूळ तारूं;

तुं अल्या कोण ने कोने वळगी रह्यो, वगर समजे कहे म्हारूं म्हारूं. स.

देह तारी नथी जो तुं जुगते करी, राखतां नव रहे निश्चे जाये;

देह संबंध तजे, नवनवां बहु थशे, पुत्र कलत्र परिवार व्हाए. स.

धनतणुं ध्यान तुं, अहोनिश आदरे, ए ज तारे अंतराय मोटी;

पासे छे पियु अल्या, तेने नव पारखियो, हाथथी बाजी गइ थयोरे खोटी. स.

भरनिद्रा भर्या, रोंधि घेर्यो घणो, संतना शब्द सुणि कां न जागे;

न जागता नरसैंया लाज छे अति घणी, जन्मोजन्म तारी खांत भांगे. स.

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