BhaktiVed
कृष्ण

बापजी पाप में

garbaरचना: નરસિંહ મહેતા (Narsinh Mehta)

बापजी पाप में, कवण कीधां हशे, नाम लेतां तारूं निद्रा आवे;

उंघ आलस्य, आहार में आदर्यो, लाभविना लव करवी भावे. बाप.

दिन पुंठे दिन तो वही जाय छे, दुरमतिनां में भर्यां रे डालां;

भक्ति भूतल विषे नव करी ताहरी, खांड्यां संसारनां थोथां ठालां बाप.

देह छे जूठडी, करम छे जूठडां, भीडभंजन तारूं नाम साचुं;

फरि फरी वरणवुं, श्रीहरि तूजने, पतितपावन तारुं नाम जाचुं. बाप.

तारी करुणा विना कृष्ण कोडामणा, कळ अने विकळनुं बळ न फावे;

नरसैंया रंकने, झंखना ताहरी, हेड बेडी भागो शरण आवे बाप.

इस पाठ का वीडियो नहीं है।YouTube पर खोजें

ये भी पढ़ें