BhaktiVed
ॐ

भगति रूपी मणि लेजो हाथमां रे

भजनरचना: ગંગાસતી (Gangasati)

भगति रूपी मणि लेजो हाथमां रे

भगति रूपी मणि लेजो हाथमां रे,माया रूपी वननो भे मटी जाय,

जोग रूपी दीपक कहीए ई तो, जेनाथी विषय वासना बुझाय रे.

भगति रूपी मणि लीओने हाथमां रे...

भगति रूपी मणि जेना रे हाथमां ने, तेने नडे नहीं विषयना वाय रे

अखंड प्रकाश कोई दि’ ओलाय नैं ने, भगति हरिनी परगट थाय रे.

भगति रूपी मणि लीओने हाथमां रे...

हठ वश थईने शठ करे साधना पण, भगति विना हरि नो भजाय,

पुरण पुरषोत्तमने भगति छे वाली रे, भगत वश वैकुंठराय रे.

भगति रूपी मणि लीओने हाथमां रे...

भगतिये व्रजना वनमां ओछव कीधां ने, अजितने जीत्या एना दास

गंगासती एम बोलियां पछे रे, वृथा नो जाय एनी सुवास रे.

भगति रूपी मणि लीओने हाथमां रे...

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