BhaktiVed
कृष्ण

भुतळ भक्ति पदारथ

garbaरचना: નરસિંહ મહેતા (Narsinh Mehta)

भूतळ भक्ति पदारथ मोटु, ब्रह्म लोकमां नाहीं रे,

पुण्य करी अमरापुरी पाम्या, अंते चोराशी मांही रे

हरिना जन तो मुक्ति न मागे, मागे जन्मोजन्म अवतार रे;

नित्य सेवा नित्य किर्तन ओच्छव, निरखवा नंदकुमार रे; भूतळ.

भरत खंड भूतळमां जनमी जेणे गोविंदना गुण गाया रे;

धन धन रे एना मात पिताने, सफल करी एणे काया रे. भूतळ.

धन वृंदावन धन ए लीला, धन ए व्रजना वासी रे;

अष्टमहा सिद्धि आंगणिये उभी, मुक्ति छे एमनी दासी रे. भूतळ.

ए रसनो स्वाद शंकर जाणे, के जाणे शुक जोगी रे;

कंई एक जाणे पेली व्रजनीरे गोपी, भणे नरसैंयो जोगी रे. भूतळ.

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