BhaktiVed
ॐ

एटली शिखामण दई

भजनरचना: ગંગાસતી (Gangasati)

एटली शिखामण दई

एटली शिखामण दई चित्त संकेल्युं,

ने वाळ्युं सतीए पद्मासन रे,

मन वचनने स्थिर करी दीधुं

ने अंतर जेनुं छे प्रसन्न रे...एटली.

चित्त संवेदन सर्वे मटाडी दीधुं

ने लागी समाधि अखंड रे,

महादश प्रगटावी ते घडी

ने एकाग्र थया पंड ब्रह्मांड रे...एटली.

ब्रह्म रूप जेनी वृत्ति बनी गई

ने अंतर रह्युं नहि लगार रे,

सुरताए सुनमां जई वास कीधो,

ने अरसपरस थया एकतार रे..एटली.

नाम ने रूपनी मटी गई उपाधि

ने वृत्ति लागी पींडनी पार रे,

गंगा सतीनुं शरीर पडी गयुं,

ने मळी गयो हरिमां तार रे...एटली.

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