BhaktiVed
ॐ

Ganga Sati Jyare Swadham Gaya

BhajanAuthor: ગંગાસતી (Gangasati)

गंगा सती ज्यारे स्वधाम गया

गंगा सती ज्यारे स्वधाम गया त्यारे

पानबाईने थयो अफसोस रे,

वस्तुने विचारतां आनंद उपज्यो

ने मटी गयो मननो सर्वे शोक रे ... गंगा सती

अंतरमां बदल्युं ने निर्मळ थईने बेठां

संकल्प समरुं चित्तमांही रे,

हाण ने लाभनी मटी गई कल्पना

ब्रह्मानंद खीली गयो चित्तमांह्य रे ... गंगा सती

ज्यां रे जोवे त्यां हरि हरि भाळीया ने

रस तो पीधो अगम अपार रे,

एक नवधा भक्तिने साधतां,

मळी गयो तुरियामां तार रे .... गंगा सती

त्यां तो एटलामां अजुभा आव्या

तेने कराव्यो सत्संग रे,

गंगा सती प्रतापे पानबाई बोलिया रे

हवे कोण चडावे पुरण रंग रे ... गंगा सती

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