BhaktiVed
Krishna

Gori Taran Nepur

BhajanAuthor: નરસિંહ મહેતા (Narsinh Mehta)

गोरी तारां नेपुर

गोरी तारां नेपुर रणझण वाजणां रे,

वाज्यां कांई माझम रात मोजार;

सूतुं नगर बधुं जगाडियुं

ते तो ताहरां झांझरनो झमकार.

सेजलडी ढंढोळी हुं पाछी फरी रे,

पियुडो ते पोढ्यो पाडोशण पास;

एक ने अनेक वहालो मारो भोगवे रे,

अमने नहि अमारानी आश !

कूवो होये तो ढांकीने मूकीए रे,

सैयर ढांक्यो क्यम जाय ?

मननो मान्यो होय तो काढी मूकीए रे,

परण्यो काढी क्यम मूकाय ?

मारे आंगणे आंबो महोरियो रे,

गळवा लागी छे कांई साख;

ऊठो ने आरोगो, प्रभुजी पातळा रे !

हुं रे वेजुं ने तुं रे चाख.

मारे आंगणे द्राक्ष, बिजोरडी रे,

बिच बिच रोपी छे नागरवेल;

नरसैंयानो स्वामी मंदिर पधारियो रे,

हैयुं थयुं छे कोमळ गेहेल.

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