BhaktiVed
ॐ

हेठा ऊतरीने पाय लाग्या

भजनरचना: ગંગાસતી (Gangasati)

हेठा ऊतरीने पाय लाग्या

हेठा ऊतरीने पाय लाग्या

ने घणो छे एनो उपकार रे,

अमापक बुद्धि थई गई छे मारी,

ने लाग्यो अकर्ता पुरूषमां तार रे … हेठा.

अखंड अमर अविनाशी भाळ्या,

ने वस्तु छे अगम अपार रे,

दया करीने मुजने दरसाव्या

ने अनाम एक निरधार रे … हेठा.

समजीने वासना समाई गई,

ने अनुपम छे एक रूप रे,

आतमने भिन्न नव जाणो,

ने ए तो छे शुद्ध निरंजन भुप रे … हेठा.

सरवेनी साथे मित्रता राखजो,

ने नहि प्रीत नहि वेर रे,

गंगा रे सती प्रतापे पानबाई बोलियां रे,

एवुं समजीने करवी ले'र रे … हेठा.

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