BhaktiVed
कृष्ण

मालण लावे मोगरो रे

भजनरचना: નરસિંહ મહેતા (Narsinh Mehta)

मालण लावे मोगरो रे

मालण लावे मोगरो रे, काची कळीनो हार;

आवतां भींजे चूंदडी,रण मेघ न पडे धार.

रूपला केरी ऊंढालणी रे, सोना केरी थाळ;

पीरसे पद्मिनी पातळी रे, तमे आरोगो नंदलाल.

चंद्र विना शी चांदनी रे, दीवडा विना शी रात;

हरजी विना शी गोठडी, मारे जवुं शामळिया साथ.

पांचसात गोपीओ टोळे मळी रे, ऊभी चांपलिया हेठ;

छेल कानुडो आवशे,पेली पातलडीने घेर.

आंबुडो वावे मलगुगडो, जांबुडो लहरे रे जाय;

भले मळ्यो महेता नरसैंनो स्वामी, मारी हृदया टाढी थाय

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