BhaktiVed
ॐ

Mandane Sthir Kare Jagine Jane

BhajanAuthor: ગંગાસતી (Gangasati)

मनडाने स्थिर करे जागीने जाणे

मनडाने स्थिर करे जागीने जाणे भले

वर्ते ई संसार वहेवार मांह्य रे

भीतर जगाड्या जेणे मांह्यलाने माण्यो एणे

माया करे नहीं कांई रे ... मनडाने.

अभ्यास आदर्यो ने भ्रमणाओ भांगी

आनंद उपज्यो अपार रे

आठेय पहोर ए तो मस्त थईने रहे

साधी साहेब साथे तार रे...

सत वस्तुमां जेनुं चितडुं बळी गयुं ने

चारे वाणीथी ए पार जी

सपनानो मोह आवा गुणीजन करे नहीं

हरदम भजनमां होंशियार जी

वासना बळी गई, तृष्णा टळी गई ने

मोहनी मटी गई ताणावाण जी

गंगा सती रे एम बोलिया रे पानबाई

साचा साधुनी ओळखाण जी .... मनडाने स्थिर

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