BhaktiVed
माता

मेहेल पीतांबर, अंबर माहरूं

garbaरचना: નરસિંહ મહેતા (Narsinh Mehta)

मेहेल पीतांबर, अंबर माहरूं, सुरज उग्यो सुई क्यम रहीए;

अम घर सासु नणंद जूठी वसे, कंथ पूछे त्यारे शुरे कहीए.

सावज शब्द करे अति सुंदर, दीपक तेज तो क्षीण थाए;

कंठथी कुसुमनो हार करमाईयो, बाहेर राग पंचम गाये.

तुं तारे मंदिरे, प्रेमशुं पोढीओ, माहरे मंदिर दूर जावुं;

लोकनी लाज, लोपीरे लक्ष्मीवर, हुं रे वळती हवे नहीं रे आवुं.

धेन दोहोवी घेररे, वाछरू वलवले, महीरे वलोववुं आज माहारे;

कंठथी बाहर काढि कमलापति, काल आवे हवे कोण तारे.

सुरत संग्रामनी, शांतिज हुई, रहीरे उजागरी, शीश नामी;

नरसिंहाचो स्वामी सुखसागर पोढियो, विरहनी वेदना त्यारे वामी.

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