BhaktiVed
कृष्ण

नहि रे विसारुं हरि

भजनरचना: મીરાંબાઈ (Meera Bai)

नहि रे विसारुं हरि, अंतरमांथी नहि रे विसारुं हरि.— टेक.

जल जमुनानां पाणी रे जातां, शिर पर मटकी धरी— अतंरमांथी १.

आवतां ने जातां मारग वच्चे अमूलख वस्तु जडी— अतंरमांथी २.

आवतां ने जातां वृन्दा रे वनमां चरण तमारे पडी— अतंरमांथी ३.

पीळां पितांबर जरकशी जामा, केसर आड करी— अतंरमांथी ४.

मोरमुगट ने काने रे कुंडल, मुख पर मोरली धरी— अतंरमांथी ५.

बाइ मीरां कहे प्रभु गिरधरनां गुण, विठ्ठल वरने वरी— अतंरमांथी ६.

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