BhaktiVed
कृष्ण

निरखने गगनमां कोण घूमी रह्यो

भजनरचना: નરસિંહ મહેતા (Narsinh Mehta)

नीरखने गगनमां कोण घूमी रह्यो, ते ज हुं ते ज हुं शब्द बोले

श्यामना चरणमां ईच्छुं छुं मरण अहींया को नथी कृष्ण तोले. नी०

श्याम शोभा घणी, बुद्धि ना शके कळी, अनंत ओच्छवमां पंथ भूली

जड ने चैतन्य रस करी जाणवो, पकडी प्रेमे सजीवन मूळी. नी०

नीरखने गगनमां कोण घूमी रह्यो, ते ज हुं ते ज हुं शब्द बोले

श्यामना चरणमां ईच्छुं छुं मरण, अहींया को नथी कृष्ण तोले. नी०

श्याम शोभा घणी, बुद्धि ना शके कळी, अनंत ओच्छवमां पंथ भूली

जड ने चैतन्य रस करी जाणवो, पकडी प्रेमे सजीवन मूळी. नी०

झळहळ ज्योत उद्योग रविकोटमां, हेमनी कोर ज्यां नीसरे तोले

सच्चिदानंद आनंद-क्रीडा करे, सोनाना पारणा मांही झूले. नी०

बत्ती विण, तेल विण, सूर्य विण जो वळी, अचळ झळके सदा अनळ दीवो

नेत्र विण नीरखवो, रूप विण परखवो, वणजिह्वाए रस सरस पीवो. नी०

अकळ अविनाशी ए, नव ज जाये कळ्यो, अरध-ऊरधनी मांहे महाले

नरसैंयानो स्वामी सकळ व्यापी रह्यो, प्रेमना तंतमां संत झाले. नी०

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