BhaktiVed
कृष्ण

ओ व्रजनारी !

भजनरचना: દયારામ (Dayaram)

ओ व्रजनारी !

ओ व्रजनारी ! शा माटे तुं अमने आळ चडावे ?

पुण्य पूरव तणां, एथी पातळीयो अमने लाड लडावे.

में पूरण तप साध्यां वनमां, में टाढतडका वेठ्यां तनमां,

त्यारे मोहने म्हेर आणि मनमां, ओ व्रजनारी !

हुं चोमासे चाचर रहेती, घणी मेधझडी शरीरे सहेती,

सुखदुःख कांइ दिलमां नव ल्हेती, ओ व्रजनारी !

मारे अंग वाढ वढाविया, वळी ते संघाडे चडाविया,

ते उपर छेद पडाविया, ओ व्रजनारी !

त्यारे हरिए हाथ करी लीधी, सौ कोमां शिरोमणि कीधि,

देह अर्पी अर्ध अंगे दीधी, ओ व्रजनारी !

माटे दयाप्रीतमने छुं प्यारी, नित्य मुखथी वगाडे मुरारि,

मारा भेदगुण दीसे भारी ! ओ व्रजनारी !

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