BhaktiVed
कृष्ण

पाछली रातना नाथ पाछा वळ्या

भजनरचना: નરસિંહ મહેતા (Narsinh Mehta)

पाछली रातना नाथ पाछा वळ्या

पाछली रातना नाथ पाछा वळ्या, शुं करुं रे सखी ? हुं न जागी;

नीरखतां नीरखतां निद्रा आवी गई, वहालोजी दई गया वाच, राखी.

कृष्णजी क्यां हशे ? शोक्य सुणशे हवे ? परथम जई एने पाय लागुं;

सरस छे शामळो, मेलशे आमळो, जई रे व्हाला कने मान मांगुं.

‘ऊठ आळस तजी, नाथ नथी गया हजी, द्वार ऊभा हरि हेत जोवा;’

धन्य रे धन्य नरसैंयाना नाथ ने, अ-सूर थाशे मारे धेन दोहवा.

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