BhaktiVed
కృష్ణుడు

पाछली रातना, पधारिया नाथजी

garbaరచన: નરસિંહ મહેતા (Narsinh Mehta)

पाछली रातना, पधारिया नाथजी, घूमते लोचने अंग डोले;

बेहु पासा सुंदरी, बाहे कंठे धरी, शोभित भवन को नहीरे तोले;

हुं रे सन्मुख हुई, रीस मननी गई, उभी रही चकित गति प्रेम निरखु;

प्रभुयने रसभरी, सुखदाज शर्वरी, नार सौभाग्यता जोईरे हरखुं.

चोकतणा चार, चरणशुं मुक्ति धरी, प्रभुने पधराविया पलंग पीठे;

भोग संजोगथी, अधिक सुख भोगव्युं, एरे मुरत एणीपेर दीठे.

भणे नरसिंहयो नित नेह ते नवनवा, जाहारे गोविंद गुणनी समाधी;

शुं जाणे ब्रह्मा सुर स्नेहनी वारता, भर्या अधिकारनी आधिव्याधि.

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