BhaktiVed
कृष्ण

पलंग पाये तने कुसुममाळावडे

garbaरचना: નરસિંહ મહેતા (Narsinh Mehta)

पलंग पाये तने कुसुममाळावडे, बेहु कर बांध्यो लाज लोपी;

माहरे मंदिरथकि कोण मूकावशे, शुं करशे सहु शोक्य कोपी.

तुं वनमाळी काहावे, हुं कुसुम वनवेलडी, नीर नित सींचतो कां अरोपी;

भ्रमर जाए फुल, फुल मकरंद वश, कमळमां हेत न रह्योरे रोपी.

प्रीतनो करनार प्रेमना पात्रशुं, तन मन प्राण त्यां मेले सोंपी;

भणे नरसईओ जेम रीस ऊतरे, त्यम तुं शिख शाणी दे रे गोपी.

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