BhaktiVed
Krishna

Pao Premras Pranjivan

BhajanAuthor: દયારામ (Dayaram)

आंखोमां ऊडे गुलाल

पाओ प्रेमरस प्राणजीवन दीन थई याचुं रे

मुक्तिमार्गीने आपजो ज्ञान हुं तो नव राचुं रे

रीझे राबडी थकी गरीबलोक भोगीने नव भावे रे

अमो राजनां खासां खवास मुक्ति मन ना'वे रे

नित्य नीरखीए नटवररूप होंश मनमांथी रे

मनमान्युं मळे सहु सुख एकतामां क्यांथी रे

दिव्य रूप छो सदा साकार आनंदना राशि रे

बोले अनुचित मायिक मुग्ध नरकना वासी रे

दुष्ट जीवने कहे छे ब्रह्म जीव ब्रह्म लेखे रे

छते स्वामीए सुहागनुं सुख स्वप्ने न देखे रे

आप स्वामी सदा हुं दास नातो ए निभावो रे

रुचे आपने पडो एवी टेव अन्य रखे पाडो रे

विना लालचनुं लाल व्हाल आटलुंक आपो रे

विषयवासना प्रपंचनी प्रीत कृष्ण मारी कापो रे

अनन्य सेवा अखंड सतसंग मनोहर मांगुं रे

दया प्रीतमजी आपो मुने एह पाये लळी लागुं रे

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