BhaktiVed
రాముడు

शीलवंत साधुने वारे वारे नमीए

భజనరచన: ગંગાસતી (Gangasati)

शीलवंत साधुने वारे वारे नमीए

शीलवंत साधुने वारे वारे नमीए, जेनां बदलाय नहीं व्रतमान जो;

रामभरुसो राखे हृदयमां जेने, महाराज थया महेरबान रे…..

स्नेह के शत्रु कोई नथी, जेना दिलमां परमारथ उपर प्रीत रे;

सतगुरू सानमां पूरण समजे ने, रूडी रूडी पाळे रीत रे…… शीलवंत साधुने…

वहेवारनी वातो जेने गमती नथी, भजनमां रहे भरपूर रे;

अलखने लख कही लाभ ज लेतां, जेनां नेणलामां वरसे नूर रे….. शीलवंत साधुने….

पर उपकारमां करवा प्रवृत्ति ने, निवृत्तिमां निज रूप रे;

पोते रहीने पोषे बीजाने, एवां संत साहेबना स्वरूप… शीलवंत साधुने….

संगत करो तो एवा नरनी करजो, पमाय एथी भव पार;

गंगासती कहे सांभळो पानबाई, देखाडे अलखना द्वार… शीलवंत साधुने….

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