BhaktiVed
कृष्ण

वैकुंठ ढूंकडुं रे

भजनरचना: નરસિંહ મહેતા (Narsinh Mehta)

वैकुंठ ढूंकडुं रे

वैकुंठ ढूंकडुं रे मारा हरिजन हृदे हजूर. टेक

दुरिजनियाने दूर दीसे छे, प्रेमीजनने उर. वैकुंठ०

काम, क्रोध, मद, लोभ, निवारी, काढे पापनुं मूळ,

पुण्यपंथे पग धरे, दूर करी माया ममता शूळ. वैकुंठ०

रटे जिह्‌वाए नाम रामनुं, भूख्याने दे अन्न,

परनारी माता पेखे, पथ्थर लेखे परधन. वैकुंठ

पीडे नहि कदी पर आत्माने, मारे निजनुं मन,

भणे नरसैंयो प्रिय करी माने हरि एवा हरिजन. वैकुंठ०

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