BhaktiVed
शिव

लवथवती विक्राळा (शंकराची आरती)

आरतीरचना: समर्थ रामदास (Samarth Ramdas)Marathi Shiv aarti; Mahashivratri
लिपि
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लवथवती विक्राळा ब्रह्मांडी माळा।

वीषे कंठ काळा त्रिनेत्री ज्वाळा॥

लावण्यसुंदर मस्तकी बाळा।

तेथुनिया जळ निर्मळ वाहे झुळझुळा॥

जय देव जय देव जय श्रीशंकरा।

आरती ओवाळू तुज कर्पूरगौरा॥

जय देव जय देव।

कर्पूरगौरा भोळा नयनी विशाळा।

अर्धांगी पार्वती सुमनांच्या माळा॥

विभुतीचे उधळण शितिकंठ नीळा।

ऐसा शंकर शोभे उमावेल्हाळा॥

जय देव जय देव जय श्रीशंकरा।

आरती ओवाळू तुज कर्पूरगौरा॥

जय देव जय देव।

देवी दैत्यी सागरमंथन पै केले।

त्यामाजी अवचित हळाहळ जे उठिले॥

ते त्वा असुरपणे प्राशन केले।

नीळकंठ नाम प्रसिद्ध झाले॥

जय देव जय देव जय श्रीशंकरा।

आरती ओवाळू तुज कर्पूरगौरा॥

जय देव जय देव।

व्याघ्रांबर फणिवरधर सुंदर मदनारी।

पंचानन मनमोहन मुनिजनसुखकारी॥

शतकोटीचे बीज वाचे उच्चारी।

रघुकुळटिळक रामदासा अंतरी॥

जय देव जय देव जय श्रीशंकरा।

आरती ओवाळू तुज कर्पूरगौरा॥

जय देव जय देव।