BhaktiVed
ॐ

असली जे संत होय ते

भजनरचना: ગંગાસતી (Gangasati)

असली जे संत होय ते

असली जे संत होय ते चळे नहीं कोई दि

कपट नहीं मन मांह्य जी,

गुरुजीना वचनोने परिपूर्ण समजे

प्रज्ञी पुरुष कहेवाय जी.

देह रे मूके पण वचन तूटे नहीं ने

गुरुजीना वेचाये वेचाय जी

ब्रह्मादिक आवी जेना पारखां रे लेवे तोये

आ मरजीवा जीवी जाय जी ... असली जे संत

अमरीया बनी जे नितनित खेले रे

मरवुं तो आळपंपाळ जी

त्रिविधिनां तापमां जगत बळे छे पण

एने लागे नहीं जरी जोने झाळ रे ... असली संत.

जीवनमरणनी फेर्युं जेणे टाळ्युं ने

लाभ ने हानि मटी जाय जी,

आशा ने तृष्णा जेने एके नहीं उरमां

भक्त परम ए कहेवाय जी ... असली संत

मनथी रे राजी तमे एम ज रहेजो

तो रीझे सदा नकळंक रायजी

गंगासती एम बोलिया रे पानबाई

असली रे संत ई गणाय जी ... असली जे संत

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