BhaktiVed
ॐ

Brahmalila

Bhajan

ब्रह्मलीला

चोखरो-१

(राग:सामेरी)

ॐ नमो आदि निरंजन राया, जहां नहि काळ कर्म अरू माया;

जहां नहि शब्द उच्चार न जंता, आपे आप रहे उर अंता(अंदर).

"छंद"

उर अंतरमें आप स्वबस्तु, ढिग(पासे) नहीं माया तबें(त्यारे);

अन्य नहि उच्चार करिवे, स्वस्वरूप होहीं जबें(ज्यारे).....१

मिथ्या माया तहां कल्पित, अध्यारोप किनो सही;

अर्द्धमात्रा स्वभाव प्रणव सो, त्रिगुण तत्व माया भइ.....२

आप ज्यौं के त्यौं निरंजन, सर्व भाव फेली अजा(माया);

ज्यों चुंबक देखकें लोह चेतन, त्यौं दृष्टोपदेश पाइ रजा.....३

परम चैतन आदि निरंजन, अकरता पद सो सदा;

अजा अल्प अर्वाक(अर्वाचीन) अंजन(मेल), भो(थयुं) जगत पलमें तदा(त्यारे).....४

सगुणब्रह्म सो स्तुति पदारथ, दृष्ट पदारथस्वामिनी(वस्तुनां मालीक);

अखा ब्रह्म चैतन्यघनमें, भइ अचानक दामिनी(वीजळी).....५

चोखरो-२

ऐसें आप सगुनब्रह्म स्वामी, ऐसें ही अंश भयो बहुनामी;

आप फ्लाव किनो गृहि माया, सहज भोग करि सुत तीनुं(त्रण) जाया(उपजाव्या).

"छंद"

जाये तीन सुत जगतकारन, सत्व रज तमसादि भये;

पंचभूत अरू पंचमात्रा, तमोगुन केरे कहे.....१

देव दश अरू उभय इंद्रिय, बेग(शीघ्र) उपजे रजहींके;

भये चतुष्टय सत्वगुनके, काम दिनो कर अजहींके.....२

रजोगुन सो आप ब्रह्मा, तमोगुन सो रूद्र हे;

सत्वगुन सो विष्णु आपे, सगुनब्रह्म पहुंची चहे.....३

चार पंचक अरू चतुष्ट्य, एक प्रकृति मूलकी;

आपको परिवार बढायो, भइ माता श्थुल की.....४

चली आवे कला चिद्की, बन्यो पुरूष विराट ए;

कहे अखा माया कहो के, कहो परब्रह्मघाट ए.....५

चोखरो-३

ऐसेइ अंश चल्यो अविनाशी, ताकी भांति भइ लक्ष चोराशी;

निर्गुण ब्रह्म सगुन भयो ऐसें, ताकों ओर कहींजे कैसें.

"छंद"

ओर नहि कोइ कल्प हरितें, ज्यां पानिको पाला(बरफ) भयो;

जोइ निर्गुन सोइ सगुन हे, नामरूप आपें नयो.....१

नाम नहिं ताके नाम सब हे, रूप नहिं ताके रूप सबें;

कारज कारन और नांहीं, रूप अरूपी व्हैं(थइने) फ्रबे(शोभे).....२

सगुन बेत्ता निर्गुनको हे, निर्गुन पोषक सगुनको;

ज्यौं पुरूषकी परछांहि दर्पन, आनन(मुख) समर्यो जंनको.....३

जडको रूप चैतन्य लीनो, चैतन्य ज्योंको त्यों सदा;

रूपबिना खेल फ्बुत(शोभतो) नांहीं, आप बन्यो अपनी मुदा(प्रसन्नताथी).....४

सहज इच्छा बानक(रचना) बन्यो हे, अन्य नहि कोउ आपतें;

कहे अखा अहंकृति दुजी, मान लीनी व्यापतें.....५

चोखरो-४

ऐसो रमन चल्यो नित्य रासा, प्रकृति पुरुषको विविध विलासा;

जेसें भींत रची चित्रशाला, नाना रूप लखे ज्यों विशाला.

"छंद"

बिशाल दर्पन भींत कीनि, ओर स्वच्छ सत्य स्वामिनी;

ताहीके मध्य भांती भासी, वेसि सत्य सुहावनी(शोभती).....१

त्यों अजाक मधि भांती नाना, वस्तु विशेषहीं भासी हे;

आत्मा अकर्ता अभोग अवयव, जानत जीव विलासी हे.....२

प्रकृति पुरुषके जोग जंतुन, मिथ्या पुरुष प्रकट भयो;

सो आध नाहीं अंत्य नाही, मध्य मानि तापें रह्यो.....३

संशय मिथ्या विपरीतभावना, जब लगी जो नर करै;

तबलगी नाना देह धरहीं, मायामें उपजै मरै.....४

पिंड पर सो मोह पायो, पुरंजन तातें भयो;

कहे अखा यह जीवौत्पत्ति, मान मिथ्या ले रह्यो.....५

चोखरो-५

सदा सर्वदा नाटक माया, नाटक चले देखे परब्रह्म राया;

सो सब ले अपने शिर जंता, तातें न आवहीं जीवको अंता.

"छंद"

अंत न आवहीं कृत्य भावहीं, रंजना(प्रीती) देहसों सदा;

में ममता कर आप पोखे, त्यों त्यों मन पावै मुद्दा.....१

स्वरूप जेसो पुत्र वंध्या, कर्म नित ऐसें करे;

आकाशकी नित्य मोट(पोटली) बांधे, भंडार ले अपना भरे.....२

अजाये(नहि जन्मेलां) नर सुभट योद्धा, ताहीकी सेना रची;

गांधर्वनगरी जीतिवेकों, चले राय सुंदर शुची.....३

जय पराजय नित्य पावे, हर्ष शोक ह्रदे विषे;

तन मनके आनंद कारन, कर्ममादक नित भखे.....४

असंभावना(संशय) विपरीतभावना, ताहीके हियमें रही;

कहे अखा ए जीवनलच्छन, उत्पत्ति स्थिति वाकी कही.....५

चोखरो-६

होता नहीं अबें नाहीं आगें, मिथ्या भ्रम भ्रमिवेकों(भमवा माटे) लागे;

ज्यौं देहके संग छाया होइ, सो मिथ्या नां सांची(सत्य) सोइ.

"छंद"

नांहीं मिथ्या नांहीं सांचो, रूप ऐसो जीवको;

जन्म मरन औ भ्रमन संशय, चल्यो जाइ सदैवको.....१

ताही अचानक चेतना जब, उपजें नरके विषे;

जन्म मरन औ भोग सुख दुःख, काल कर्म फलकों लखे.....२

यही बिचार गुरुतें आयो, आतुरता उपजी खरी;

चरनकमल पर शीश धरके, सेवा स्तुति अतिशय करी.....३

कीनी जु नवधा भक्ति भावैं, अधिकारपरते गुरु कही;

प्रेमातुर वैराग केवल, जेसी कही तेसी ग्रही.....४

कहे अखा महावाक्य गुरु को, ऊग नीकसे आपसें;

ज्ञानअर्ककी जोन्हसों(जेवडे) कर, रह्यो नहि मन मापसें.....५

चोखरो-७

जैसे अंड पिंड फूटैं विहंगा(पक्षी), और रूप भयो ओरही रंगा;

आगें अंडमध्य गंदा पानी, चलन हलन ताकी कोमल बानी.

"छंद"

बानी कोमल अंग खेचर(पक्षी), भूचरभावना सब टरी;

तेसें जंत प्रसाद गुरु तें, अहंता अपनी गिरीं.....१

यथारथ स्वस्वरूप हरिको, हरिजनके उरमें बस्यो;

सांख्ययोग सिद्धांत पायो, कह्यो गुरु त्यां अभ्यस्यो(अभ्यास).....२

तत्वमसि जो बाक्य श्रुतिको, गुरुकृपातें सो भयो;

आध जीव मिथ्या कह्यो, तब ऐसेंको ऐसो कह्यो.....३

आप परबिन खेल देख्यो, नित्य नाटक संभ्रमैं;

अरूपमध्य स्वरूप भास्यो, ज्यों पुतरिका(पुतळी) खंभमें.....४

यह अखा ऐसोइ जाने, ताइके घट उपजै;

जैसे को तैसो भयो जब, मध्यतें अहंता तजै.....५

चोखरो-८

महाजन जाने महाकल(युक्ति) भेवा(भेद), जो परब्रह्म पर्यो सत्यमेवा;

ज्यां चुंबकतें चेतन भयो लोह, जीवपनो ताको यों खोहा(खोवायुं).

"छंद"

खोहा गयो बिच बल अजाको, ताहीतें चेतन भयो;

अंधा अचानक नेंन पायो, द्वंद्व बिचतें टर गयो.....१

स्तुति पदारथ नयन देख्यो, दृष्ट पदार्थ गया बिला(विलीन);

मिटी देहकी भावना अब, स्वयं चैतन व्है चला.....२

ध्येय ध्याता अरू करन कारन, मायाके मध्य जो सही;

रज्जु लगी सो भुजंग भ्रम हें, बिन रज्जु केसो अही.....३

प्रीछीवेको प्रताप बडहे, जानही बिरला जना;

आगें पाछें ओर नांही, आप बिलस्या आपना.....४

कहे अखा ए ब्रह्मलीला, बडभागी जन गायगो;

हरि हीरा अपने ह्रदय में, अनायाससों पायगो.....५

'श्रीब्रह्मलीला संपूर्ण'

संदर्भ

पुस्तक "अखानी वाणी".प्रकाशक : सस्तु साहित्य मुद्रणालय,भिक्षु:अखंडानंदजी द्वारा.आवृति बीजी,सने-१९२४

आ पण जूओ

अखाना छप्पा

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