BhaktiVed
ॐ

काळधर्म ने स्वभावने जीतवो

భజనరచన: ગંગાસતી (Gangasati)

काळधर्म ने स्वभावने जीतवो

काळधर्म ने स्वभावने जीतवो,

राखवो नहि अंतरमां क्रोध रे

समानपणेथी सर्वेमां वर्तवुं,

ने टाळी देवो मननो विरोध रे ... काळधर्म.

निर्मळ थईने कामने जीतवो,

ने राखवो अंतरमां वैराग रे,

जगतना वैभवने मिथ्या जाणी,

ने टाळी देवो दुबजानो डाघ रे ... काळधर्म.

आलोक परलोकनी आशा तजवी,

ने राखवुं अभ्यासमां ध्यान रे,

तरणा समान सहु सिद्धिओने गणवी,

ने मेलवुं अंतरनुं मान रे ... काळधर्म.

गुरुमुखी होय तेणे एम ज रहेवुं,

ने वर्तवुं वचननी मांय रे,

गंगा सती एम बोलियां रे,

एने नडे नहि जगतमां कांई रे ... काळधर्म.

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