BhaktiVed
ॐ

कळजुगमां जति सती

భజనరచన: ગંગાસતી (Gangasati)

कळजुगमां जति सती संताशे ने

कळजुगमां जति सती

कळजुगमां जति सती संताशे ने

करशे एकांतमां वास रे,

कुडा ने कपटी गुरु ने चेला

परस्पर नहीं विश्वास रे ... कळजुगमां

गुणी गुरु ने चतुर चेलो पण

बेयमां चालशे ताणावाण रे,

गुरुना अवगुण गोतवा मांडशे ने

गादीना चालशे घमसाण रे ... कळजुगमां

चेलको बीजा चेला पर मोहशे ने

पोते गुरुजी थईने बेसे रे,

गुरुनी दिक्षा लई शिक्षा न माने

ज्ञान के गम नहीं लेश रे ... कळजुगमां

चेलो चेला करी कंठीओ बांधशे ने

बोधमां करशे बकवाद रे,

पेटने पोषवा भीखीने खाशे ने

पुरुषार्थमां परमाद रे ... कळजुगमां

धनने हरवा छळ करशे ने

नितनवा गोतशे लाग रे,

आसन उथापी करशे उतारा ने

विषयमां एने अनुराग रे ... कळजुगमां

वादविवाद ने धरमकरममां

चूकशे नहीं करता ए हाण रे,

गंगासती कहे एवाथी चेतजो

कलजुगना जाणी परमाण रे ... कळजुगमां

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