BhaktiVed
కృష్ణుడు

लोचन – मननो झघडो

భజనరచన: દયારામ (Dayaram)

पद ४थुं – राग साखी.

लोचन मननो रे, के झघडो लोचन मननो !

रसिया ते जननोरे, के झघडो लोचन मननो ! –टेक.

प्रीत प्रथम कोणे करी, नंदकुंवरनी साथ;

मन कहे लोचन तें करी, लोचन कहे तारे हाथ. झघडो लोचन.

नटवर निरख्या, नेण तें, सुख आव्युं तुज भाग;

पछी बंधाव्युं मजने, लगन लगाडी आग. झघडो लोचन.

सुण चक्षु हुं पांगळुं, तुं मारुं वाहंन;

निगम अगम कह्युं सांभळ्युं, दीठा विना गयुं मंन. झघडो लोचन.

भलुं कराव्युं में तने, सुंदरवर संजोग;

हुंने तजी तुं नित मळे, हुं रहुं दुःखविजोग. झघडो लोचन.

वनमां व्हालाजी कने, हुं वसुं छुं नेण;

पण तुंने नव मेळवे, हुं नव भोगवुं चेन. झघडो लोचन.

चहेन नथी मन क्यम तुंने ? भेटे श्याम शरीर;

दुःख मारुं जाणे जगत, रात्र दिवस वहे नीर. झघडो लोचन.

मन कहे : “धीकुं हृदे धूम्र प्रगट त्यां होय;

ते तुजने लागे रे नेण, ते थकी तुं रोय. झघडो लोचन.

ए बेहु आव्यां बुद्धिकने, तेणे चुकव्यो न्याय,

मन ! लोचननो प्राण तुं, लोचन तुं मनकाय. झघडो लोचन.

सुखथी सुख, दुःख दुःखथी, मनलोचन ए रीत,

दया प्रीतम श्रीकृष्णशुं बेहु वडेथी प्रीत. झघडो लोचन.

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