BhaktiVed
ॐ

Man Vritti Jeni Saday Nirmal

BhajanAuthor: ગંગાસતી (Gangasati)

मन वृत्ति जेनी सदाय निर्मळ

मन वृत्ति जेनी सदाय निर्मळ

पडे नहीं भवसागर मांह्य रे,

सदगुरूना चरणमां चित्त मळी गयुं

लागे नहीं माया केरी छांय रे ....

पितृ ग्रह देवता कोई नडे नहीं

जेनुं बंधाणुं वचनमां चित्त रे

आवरण एने एके नहीं आवे

विपरित नथी जेनुं मन रे .... मन वृति जेनी

अंतरनी आपदा सर्वे मटी गई

जेने सदगुरु थया महेरबान रे

मन कर्म थकी जेणे वचन पाळ्युं

मेली दीधुं अंतर केरुं मान .... मन वृति जेनी

हानि ने लाभ एके नहीं जेने उरमां

जेने माथे सदगुरुनो हाथ रे,

गंगासती एम बोलिया, पानबाई

टळी गया त्रिविधनां ताप रे .... मन वृत्ति जेनी

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