BhaktiVed
ॐ

Sharir Shodhya Vina Sar Nahin

BhajanAuthor: નરસિંહ મહેતા (Narsinh Mehta)

शरिर शोध्या विना सार नहीं सांपडे, पंडितो पार नहीं पामो पोथे,

तांदुल मेलीने, तुषने वळगी रह्यो, भूख नहि भांगे एमां ठाले थोथे. श०.

रसनाना स्वादमां सर्व रूंधाई रह्यां, विगति गुरु ज्ञान विना रे गुंथे;

वाणी विलासमां, विविध वाणी वडे, परहरी वस्त्रने वळगे चुंथे. श०.

शब्द शीखे खरो, सकल विद्या भणे, आध्यात्म ऊचरे आवी ओथे;

प्रपंच पिंडमां रह्यो, अहंकार नव गयो, अनंत आथड्यो एम अनंत कोठे. श०

शास्त्र कथा कहे, रजनिमां आथडे, एम अज्ञान शीश गोठे;

भणे नरसैयो जे, भेद जाणी जुओ, में तो रची कह्युं पद चोथे श०.

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