BhaktiVed
Krishna

Khelat Men Ko Kako Gusaiyan

BhajanAuthor: सूरदास (Surdas)

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खेलत में को काको गुसैयाँ।

हरि हारे जीते श्रीदामा, बरबस ही कत करत रिसैयाँ॥

जाति पाँति हम तें बड़ नाहीं, नाहिं बसत तुम्हारी छैयाँ।

अति अधिकार जनावत याते, जाते अधिक तुम्हारे गैयाँ॥

खेलत में को काको गुसैयाँ।

रूठहिं करें तासों को खेलै, रहे बैठि जहँ-तहँ सब ग्वैयाँ।

सूरदास प्रभु खेल्यो चाहत, दाँव दियो करि नन्द दुहैयाँ॥

खेलत में को काको गुसैयाँ।

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Source: Surdas, Sursagar (Bal-lila); text as commonly sung

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