BhaktiVed
Krishna

Kesav Kahi Na Jai Ka Kahiye

BhajanAuthor: गोस्वामी तुलसीदास (Goswami Tulsidas)

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केसव, कहि न जाइ का कहिये।

देखत तव रचना बिचित्र हरि, समुझि मनहिं मन रहिये॥

सून्य भीति पर चित्र, रंग नहिं, तनु बिनु लिखा चितेरे।

धोये मिटइ न मरइ भीति, दुख पाइय इहि तनु हेरे॥

केसव, कहि न जाइ का कहिये।

रबिकर-नीर बसै अति दारुन, मकर रूप तेहि माहीं।

बदन-हीन सो ग्रसै चराचर, पान करन जे जाहीं॥

केसव, कहि न जाइ का कहिये।

कोउ कह सत्य, झूठ कह कोऊ, जुगल प्रबल कोउ मानै।

तुलसीदास परिहरै तीनि भ्रम, सो आपन पहिचानै॥

केसव, कहि न जाइ का कहिये।

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Source: Tulsidas, Vinay Patrika, pad 111; Gita Press edition