BhaktiVed
कृष्ण

उद्धवजी विचारो रे अंतर आपणे

भजनरचना: દયારામ (Dayaram)
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उद्धवजी विचारो रे अंतर आपणे

उद्धवजी विचारो रे अंतर आपणे, वणसमज्ये शी देवी रे शीख?

जोवा करकंकण जोई ए शीद आरसी? होय विचार तो पासे परीख उद्धवजी०

तमारो तो हरि व्यापक सर्वत्र छे, त्यारे कहो अधिक के ओछा क्यांय?

नित्य ऊठी जाउं छुं शीद करी रह्या? एवडुं शुं दाट्युं छे मधुपुरी मांह्य? उद्धवजी०

भमरे छे लोभी गंध कमळ ने केतकी, दूर थकी लावे छे सुगंधी ग्रही वाय,

तेटलेथी ह्रदयरंजन न थातुं होय तो शीदने दोराय? शीद कंटकमां जाय? उद्धवजी०

दशे दिशा दीसे उद्योत इन्दु तणो, पण ज्यां लगी अभ्रने ओथे चंद,

सागर कुमोदादिक फूले तो फूलजो, पण चित्तचकोरने न ऊपजे आनंद. उद्धवजी०

विचारो तो मनने सहेज रढ रुपनी, कोण जाणे वदन वपुने शुं वेर?

व्यापकनी साथे करी कहो कोणे वातडी, वातडी विना ते शी सुखनी लहेर? उद्धवजी०

त्यार लगी दयाना प्रीतम नथी ओळख्या, ज्यार लगी सत्य नथी साकार,

रूपरसप्रेमनी पीडा ते त्यारे प्रीछशो, अनुभव थाशे ओधव कोई वार. उद्धवजी०

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