BhaktiVed
ॐ

पसायदान

स्तोत्ररचना: संत ज्ञानेश्वर (Sant Dnyaneshwar)Sung at the close of satsang and in schools
लिपि
अक्षर आकार

इस पाठ की संपादकीय समीक्षा आवश्यक है।

स्रोत और संपादकीय समीक्षा · समीक्षा आवश्यक
स्रोत
Dnyaneshwar, Dnyaneshwari, chapter 18, ovis 1793–1801 (Pasaydan); standard text

उपलब्ध स्रोत और समीक्षा का विवरण यहाँ दिया जाता है। लिपि बदलना अनुवाद नहीं है। परंपराओं में पाठांतर हो सकते हैं।

आता विश्वात्मके देवे, येणे वाग्यज्ञे तोषावे।

तोषोनि मज द्यावे, पसायदान हे॥

जे खळांची व्यंकटी सांडो, तया सत्कर्मी रती वाढो।

भूतां परस्परे पडो, मैत्र जीवांचे॥

दुरितांचे तिमिर जावो, विश्व स्वधर्म सूर्ये पाहो।

जो जे वांछील तो ते लाहो, प्राणिजात॥

वर्षत सकळमंगळी, ईश्वरनिष्ठांची मांदियाळी।

अनवरत भूमंडळी, भेटतु भूतां॥

चला कल्पतरूंचे आरव, चेतना चिंतामणीचे गाव।

बोलते जे अर्णव, पीयूषाचे॥

चंद्रमे जे अलांछन, मार्तंड जे तापहीन।

ते सर्वाही सदा सज्जन, सोयरे होतु॥

किंबहुना सर्व सुखी, पूर्ण होऊनि तिहीं लोकी।

भजिजो आदिपुरुखी, अखंडित॥

आणि ग्रंथोपजीविये, विशेषी लोकी इये।

दृष्टादृष्ट विजये, होआवे जी॥

येथ म्हणे श्रीविश्वेशरावो, हा होईल दान पसावो।

येणे वरे ज्ञानदेवो, सुखिया झाला॥

इस पाठ का वीडियो नहीं है।YouTube पर खोजें

ये भी पढ़ें