शबरी के जूठे बेर
शबरी एक वनवासी वृद्धा थी। गुरु मतंग ऋषि ने देह त्यागने से पहले कहा था: 'राम आएँगे। प्रतीक्षा करना।' वह रोज़ भोर में उठती, आश्रम की राह बुहारती, फूल बिछाती, वन से बेर लाती। खट्टा बेर राम को न चला जाए, इसलिए हर बेर चखकर अलग रखती।
वर्ष बीते। वह बूढ़ी हो गई। एक दिन सीता को खोजते राम-लक्ष्मण आए। शबरी ने काँपते हाथों से जूठे बेर दिए। लक्ष्मण ठिठके। राम ने प्रेम से एक-एक बेर खाया: 'इतना मीठा फल मैंने कभी नहीं खाया।'
राजकुमार, क्षत्रिय — उन्होंने जाति नहीं देखी, जूठन नहीं देखी, केवल प्रेम देखा।
सार: भगवान फल नहीं, देने वाले का मन देखते हैं।
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हनुमान और मोतियों का हार
राम के राज्याभिषेक का दिन था। सीता ने हनुमान को एक अनमोल मोतियों का हार भेंट किया। हनुमान एक-एक मोती दाँत से तोड़कर देखते और फेंक देते।
सभा हँस पड़ी। 'वानर आखिर वानर है, मोतियों का मोल क्या जाने?' हनुमान बोले: 'जिसमें राम नहीं, वह वस्तु मेरे लिए मूल्यहीन है। इन मोतियों में राम नहीं हैं।'
'तो क्या तुममें हैं?' किसी ने ताना मारा। हनुमान ने अपना सीना चीरकर दिखाया — हृदय में सीता-राम विराजमान थे। सभा मौन हो गई। राम उठकर आए और हनुमान को गले लगा लिया।
सार: भक्त का धन बाहर नहीं, हृदय में होता है।
सुदामा की मुट्ठी भर चावल
सुदामा कृष्ण के बचपन के मित्र थे, सांदीपनि के गुरुकुल में साथ पढ़े थे। अब निर्धन ब्राह्मण; बच्चों को खाने को नहीं। पत्नी ने ज़ोर दिया: 'द्वारका जाओ, अपने मित्र से माँगो।' उसने एक कपड़े में मुट्ठी भर चावल बाँध दिए।
द्वारका में द्वारपाल फटे कपड़ों वाले को देखकर चौंके; पर कृष्ण नाम सुनते ही सिंहासन से दौड़ आए। मित्र को गले लगाया, स्वयं पैर धोए, रुक्मिणी से पंखा झलवाया। 'मेरे लिए क्या लाए?' पूछा। लज्जा से छिपाई पोटली कृष्ण ने स्वयं खींची और एक मुट्ठी चावल खा लिए — दूसरी मुट्ठी रुक्मिणी ने रोक दी।
सुदामा कुछ माँग न सके। घर लौटे तो झोंपड़ी की जगह महल था। बिना माँगे ही कृष्ण ने दे दिया।
सार: प्रेम से दी गई एक मुट्ठी, लोकों के बराबर है।
अक्षयपात्र का एक दाना
वनवास में पांडवों के पास सूर्य का दिया अक्षयपात्र था — द्रौपदी के भोजन करने तक जितनों को चाहो खिलाओ, उसके बाद खाली।
दुर्योधन ने षड्यंत्र रचा। क्रोधी दुर्वासा ऋषि को दस हज़ार शिष्यों सहित, द्रौपदी के भोजन के बाद, पांडवों के आश्रम भेजा। 'स्नान करके आते हैं, भोजन तैयार रखो,' ऋषि बोले। पात्र खाली। शाप निश्चित।
द्रौपदी ने कृष्ण को पुकारा। कृष्ण आए और बोले, 'भूख लगी है, कुछ खिलाओ।' उसने लज्जा से खाली पात्र दिखाया। किनारे चिपका एक दाना दिखा। कृष्ण ने उसे खाया और कहा, 'सब लोक तृप्त हों।'
नदी में नहाते दुर्वासा और शिष्यों का पेट एकाएक भर गया। आश्रम लौटने का साहस न हुआ; वे वहीं से चले गए।
सार: कृष्ण को एक दाना काफ़ी है — सच्चे मन से दिया हो तो।
भक्त कन्नप्प: आँख के बदले आँख
तिन्नन एक शिकारी था। वन में एक शिवलिंग देखा और अकारण प्रेम उमड़ा। पूजा कैसे होती है, नहीं जानता था। मुँह में पानी भरकर लिंग पर कुल्ला किया — वही अभिषेक। सिर पर रखे फूल — वही अर्चना। भुना माँस भोग लगाया।
मंदिर का पुजारी यह सब देखकर डर गया और छिपकर देखने लगा। एक दिन लिंग की आँख से रक्त बहा। तिन्नन ने जड़ी-बूटी लगाई, काम न आई। 'आँख के बदले आँख,' सोचकर बाण से अपनी आँख निकाली और लिंग पर लगा दी। रक्त रुक गया।
दूसरी आँख से रक्त बहा। तिन्नन हँसा, जगह न भूल जाए इसलिए पैर का अँगूठा लिंग की आँख पर रखा और दूसरी आँख निकालने चला। शिव ने हाथ पकड़ लिया: 'रुक, कन्नप्पा!' दोनों आँखें लौटा दीं।
सार: विधि न आए तो भी, प्रेम आता हो तो काफ़ी है।
मार्कंडेय: यम को हराने वाला बालक
मृकंडु ऋषि को शिव ने एक विकल्प दिया: सौ वर्ष जीने वाला मूर्ख पुत्र, या सोलह वर्ष जीने वाला ज्ञानी पुत्र? ऋषि ने ज्ञानी चुना। मार्कंडेय का जन्म हुआ।
सोलहवाँ जन्मदिन पास आया। माता-पिता को रोते देख बालक ने कारण जाना और शांत भाव से शिवलिंग को आलिंगन कर 'ॐ नमः शिवाय' जपने लगा।
नियत क्षण पर यम आए। बालक ने लिंग नहीं छोड़ा। यम ने पाश फेंका — वह बालक के साथ लिंग को भी लपेट गया। लिंग फटा और शिव क्रोध में प्रकट हुए। एक ठोकर से यम को गिरा दिया — इसीलिए वे 'कालांतक' हैं।
'यह बालक सदा सोलह का रहेगा,' शिव ने वर दिया। मार्कंडेय चिरंजीवी हो गए।
सार: जो शिव को पकड़े है, उसे काल भी नहीं खींच सकता।
अंबरीष: चक्र के पीछे भागते मुनि
राजा अंबरीष बड़े विष्णुभक्त थे। एकादशी का उपवास कर द्वादशी को पारण करने ही वाले थे कि दुर्वासा अतिथि बनकर आए। 'स्नान करके आता हूँ,' कहकर देर कर दी। द्वादशी की घड़ी बीत रही थी। व्रत बचाने के लिए राजा ने केवल एक घूँट जल लिया।
दुर्वासा लौटे और 'मुझसे पहले खा लिया!' कहकर क्रोध में जटा से एक कृत्या उत्पन्न कर राजा पर छोड़ी। राजा हिले नहीं। भक्त की रक्षा के लिए विष्णु का रखा सुदर्शन चक्र कृत्या को भस्म कर दुर्वासा के ही पीछे लग गया।
मुनि ब्रह्मा के पास भागे — 'मुझसे नहीं होगा'। शिव के पास — 'मुझसे नहीं होगा'। वैकुंठ पहुँचे — विष्णु बोले: 'मैं भक्त के अधीन हूँ। क्षमा वही करेगा।' एक वर्ष बाद मुनि अंबरीष के चरणों में गिरे। राजा अब तक पारण किए बिना उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे।
सार: भगवान भी भक्त की बात मानते हैं।
नामदेव और कुत्ते की रोटी
पंढरपुर के संत नामदेव एक दिन वन के रास्ते में रोटी सेंक रहे थे। एक कुत्ता आया और रोटी मुँह में दबाकर भागा।
नामदेव ने न लाठी उठाई, न गाली दी। घी की कटोरी हाथ में लेकर कुत्ते के पीछे दौड़े: 'विट्ठल! रुको प्रभु! रोटी सूखी है, घी लगाकर खाओ!'
देखने वाले हँसे। पर नामदेव को उस कुत्ते में विट्ठल ही दिखे। उनके पास बस यही था — हर प्राणी में पांडुरंग। कुत्ता रुका। संत ने रोटी पर घी लगाया और कुत्ते के खाने तक पास बैठे रहे।
इसीलिए वे अपने अभंग में कहते हैं: 'जिधर देखूँ तू ही तू है, और कौन दिखे?'
सार: सबमें उसी को देख सको, तो क्रोध कहाँ से आए?
अन्नमय्या की टूटी बेड़ियाँ
अन्नमय्या रोज़ वेंकटेश्वर पर एक कीर्तन लिखते थे — जीवन में बत्तीस हज़ार। पेनुगोंडा के राजा साळुव नरसिंह राय उनका गीत सुनकर मुग्ध हुए: 'एक गीत मुझ पर गाओ।'
अन्नमय्या ने मना किया: 'यह जीभ हरि को गाने के लिए है, किसी मनुष्य की स्तुति के लिए नहीं।' राजा ने क्रोध में उन्हें बेड़ियों में जकड़कर कारागार में डलवा दिया।
कारागार में अन्नमय्या ने गाया — 'भूख के समय, थकान के समय, हरि नाम ही सहारा है, और कोई नहीं'। गीत पूरा होते ही बेड़ियाँ टूटकर गिर गईं। पहरेदारों ने फिर कसीं; फिर गिरीं।
सुनकर राजा दौड़े आए और अन्नमय्या के चरणों में गिरे। अन्नमय्या तिरुमला लौटे और अंत तक केवल स्वामी को ही गाते रहे।
सार: जो कंठ भगवान के लिए गाता है, उसे कोई बेड़ी नहीं बाँध सकती।
मीरा का विष का प्याला
मीरा मेवाड़ की राजकुमारी, चित्तौड़ की बहू थीं। पर पति वे गिरिधर गोपाल को ही कहती थीं। राजमहल छोड़कर मंदिर में साधुओं के संग नाचती-गाती थीं। राजवंश के लिए यह अपमान था।
देवर विक्रमजीत ने एक दिन सोने के प्याले में विष भेजा: 'यह गिरिधर का चरणामृत है।' मीरा ने उसे चरणामृत ही माना। कृष्ण की मूर्ति को दिखाया और मुस्कुराते हुए पी गईं।
कुछ नहीं हुआ। वे गाती रहीं। कहते हैं मूर्ति का मुख नीला पड़ गया — विष उन्होंने पिया था।
फूलों की टोकरी में साँप भेजा — वह माला बन गया। कीलों का बिस्तर भेजा — वह फूलों की सेज बन गया। अंत में मीरा द्वारका पहुँचीं और कृष्ण की मूर्ति में समा गईं, ऐसा कहा जाता है।
सार: जहाँ विश्वास है, वहाँ विष भी अमृत है।
राम की उँगलियों के निशान: गिलहरी
समुद्र पर सेतु बन रहा था। वानर पहाड़ उखाड़कर पानी में डाल रहे थे। 'राम' लिखे पत्थर तैर रहे थे।
एक छोटी गिलहरी भी काम कर रही थी। समुद्र में लोटती, किनारे की रेत में लोटती, और रेत के कण सेतु पर झाड़ देती। फिर पानी में, फिर रेत में।
एक वानर हँसा और गिलहरी को उठाकर फेंक दिया: 'रास्ते में मत आ!' गिलहरी राम के चरणों के पास गिरी।
राम ने उसे हथेली पर उठाया और कहा: 'इसकी रेत पत्थरों के बीच की दरारें भर रही है। काम छोटा-बड़ा नहीं होता — जो प्रेम लगा, वही होता है।' स्नेह से उसकी पीठ पर उँगलियाँ फेरीं। वे तीन धारियाँ आज भी हर गिलहरी की पीठ पर हैं।
सार: छोटे काम में भी पूरा प्रेम लगाओ — राम देखते हैं।
रंतिदेव का आख़िरी घूँट
राजा रंतिदेव ने अपना सब कुछ दान कर दिया। अकाल पड़ा। अड़तालीस दिन वे और परिवार बिना अन्न-जल रहे।
उनचासवें दिन थोड़ा अन्न, घी और जल मिला। खाने ही वाले थे कि एक भूखा ब्राह्मण आया। राजा ने अन्न का भाग दिया। फिर एक शूद्र आया — एक और भाग। फिर कुत्तों के साथ एक व्यक्ति — बचा सारा अन्न।
अंत में बस एक घूँट पानी बचा। तभी एक चांडाल आया और बोला, 'प्यास।' राजा ने वह जल देते हुए कहा: 'मुझे न राज्य चाहिए, न स्वर्ग, न मोक्ष। सबका दुःख मुझमें आ जाए; वे दुःख से मुक्त रहें।'
ब्रह्मा, विष्णु, महेश ही उन अतिथियों के रूप में आए थे। रंतिदेव को माँगने को कुछ न बचा — वे तो पहले ही उनके पास पहुँच चुके थे।
सार: 'मेरा' मिटता है तभी पता चलता है कि सब उसका है।
बाल हनुमान और सूरज का फल
अंजना अपने नवजात पुत्र को छोड़कर फल लाने वन गईं। भूखे बालक ने आकाश में उगते लाल सूरज को देखा, 'कितना बड़ा फल!' सोचा और उड़ चला।
पवनपुत्र — हवा की गति से ऊपर गया। उस दिन सूर्यग्रहण था; राहु सूर्य को निगलने आ रहा था। बालक ने राहु को भी फल समझा और उसके पीछे पड़ा। राहु डरकर इंद्र के पास भागा।
इंद्र ऐरावत पर आए और वज्र चलाया। बालक की ठोड़ी (हनु) पर चोट लगी और वह पहाड़ पर गिरा। वायुदेव ने क्रोध में लोकों की हवा रोक दी। सबका दम घुटा, ब्रह्मा के पास दौड़े।
सब देवता आए, बालक को उठाया और एक-एक वर दिया: कोई शस्त्र न मार सके, अग्नि न जला सके, इच्छानुसार रूप — चिरंजीवी। टूटी ठोड़ी से ही नाम पड़ा 'हनुमान'।
सार: सूरज को फल समझने का साहस ही हनुमान है।
साईबाबा: पानी से जले दीये
शिरडी की मस्जिद में बाबा हर रात दीये जलाते थे। तेल के लिए गाँव के दुकानदारों से माँगते; वे दे देते।
एक दिन दुकानदारों ने मिलकर तय किया: 'इस फ़कीर को मुफ़्त तेल क्यों?' सबने कहा 'तेल नहीं है।' बाबा चुपचाप लौट आए।
उन्होंने खाली तेल के टिन में पानी भरा, उसे पिया, बचा पानी दीयों में डाला और बत्तियाँ जलाईं। दीये रात भर जले — पानी से।
दुकानदार छिपकर देख रहे थे। डर से बाबा के पैरों में गिर पड़े। बाबा बोले: 'झूठ मत बोलो। तेल देना न चाहो तो मना कर दो। पर होते हुए नहीं मत कहो।' उन्होंने शाप नहीं दिया — क्षमा किया।
सार: सच बोलना ही बाबा की माँगी एकमात्र दीप-आराधना है।
ॐ नमः शिवाय
पाँच अक्षर — न, म, शि, वा, य — पंचभूतों के प्रतीक हैं: पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश। 'मुझमें बसे शिव को नमन' — यह जप मन को शांत कर देता है।
गणेश की तीन परिक्रमाएँ
नारद कैलास पर एक ज्ञानफल लाए। 'इसे बाँटना नहीं; एक ही खाए।' गणेश और कार्तिकेय दोनों ने माँगा।
शिव ने प्रतियोगिता रखी: 'इस संसार के तीन चक्कर लगाकर जो पहले आए, फल उसका।' कार्तिकेय मोर पर बैठकर बिजली की तरह निकल गए। गणेश स्थूल; वाहन चूहा।
उन्होंने क्षण भर सोचा, हाथ जोड़े, शिव-पार्वती की तीन परिक्रमाएँ कीं और सामने खड़े हो गए। 'माँ-पिता — आप ही मेरा संसार हैं। आपकी परिक्रमा की तो पूरे संसार की हो गई।'
कार्तिकेय लौटे तो फल गणेश के हाथ में था। इसीलिए हर पूजा में पहला स्थान उनका है — बल से नहीं, बुद्धि से।
सार: माता-पिता की परिक्रमा, पूरे संसार की परिक्रमा है।
तुलसीदास: साँप की रस्सी
रामचरितमानस लिखने से पहले तुलसीदास एक साधारण मनुष्य थे — पत्नी रत्नावली पर अत्यधिक मोह। एक दिन वह मायके गई। वे रह न सके और रात में ही निकल पड़े।
वर्षा, नदी उफान पर। एक शव बहता दिखा; उसे नाव समझकर नदी पार की। उसके घर की खिड़की से एक साँप लटक रहा था; उसे रस्सी समझकर ऊपर चढ़ गए।
रत्नावली चौंकी, फिर बोली: 'हाड़-माँस के इस शरीर से जितना प्रेम है, उसका आधा भी राम से होता तो भवसागर कब का पार कर लेते।'
उस एक वाक्य ने मनुष्य को बदल दिया। तुलसीदास घर छोड़ गए। वही मोह भक्ति बना, और करोड़ों के पढ़े जाने वाले रामचरितमानस और हनुमान चालीसा बने।
सार: मोह को राम की ओर मोड़ दो, वही भक्ति है।
विदुर के घर कृष्ण: केले के छिलके
युद्ध रोकने के लिए दूत बनकर कृष्ण हस्तिनापुर आए। दुर्योधन ने राजमहल में छप्पन भोग सजाए। कृष्ण ने कहा: 'भोजन या तो प्रेम से दिया जाए या आपद में हो तो खाया जाता है। तुम प्रेम से नहीं बुला रहे; मैं आपद में नहीं हूँ।'
वे दासीपुत्र विदुर के छोटे घर गए। विदुर की पत्नी ने द्वार खोला और कृष्ण को देखकर आनंद में सुध-बुध खो बैठी। केले लेकर छीलती, फल नीचे फेंकती और छिलका कृष्ण को देती। कृष्ण बड़े चाव से छिलके खा रहे थे।
विदुर आए, देखा, पत्नी को रोका और फल दिए। कृष्ण हँसे: 'उसके दिए छिलकों का स्वाद इन फलों में नहीं है, विदुर।'
सार: कृष्ण को भोज नहीं, प्रेम चाहिए।
प्रह्लाद: खंभे में हरि
दैत्यराज हिरण्यकशिपु को एक ही बात खलती थी — उसका बेटा प्रह्लाद हर पल 'नारायण' कहता था। उसने उसे हाथियों से कुचलवाया, पहाड़ से गिरवाया, विष दिलवाया, आग में बिठाया। हर बार बालक मुस्कुराता हुआ बच निकला।
आखिर पिता गरजा: 'कहाँ है तेरा हरि? इस खंभे में है?' प्रह्लाद ने शांत स्वर में कहा: 'है। ऐसी कोई जगह नहीं जहाँ वह न हो।' हिरण्यकशिपु ने गदा से खंभा तोड़ डाला।
खंभे से आधा मनुष्य, आधा सिंह — नरसिंह — गरजते हुए प्रकट हुए। न दिन न रात की संध्या में, न घर न बाहर की देहरी पर, बिना शस्त्र, नाखूनों से दैत्य का वध किया। वही उग्र रूप प्रह्लाद के पास आते ही शांत हो गया और बालक को गोद में बिठा लिया।
सार: भक्त जहाँ पुकारे, भगवान वहीं हैं।
ध्रुव: पाँच साल के बालक की तपस्या
पाँच साल का ध्रुव पिता उत्तानपाद की गोद में बैठने चला। सौतेली माँ सुरुचि ने उसे हटा दिया: 'राजा की गोद में बैठना है तो मेरी कोख से जन्म लेना था।' पिता चुप रहे।
रोते हुए बेटे से माँ सुनीति ने कहा: 'एक ही गोद है जहाँ से कोई नहीं हटा सकता — नारायण की।' बालक वन चला गया। रास्ते में नारद मिले और 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' मंत्र दिया।
ध्रुव ने छह महीने तप किया — अंत में साँस भी रोक ली। उस निश्चलता से लोक काँप उठे। विष्णु प्रकट हुए। बालक के मुँह से शब्द न निकले; प्रभु ने शंख से उसका गाल छुआ और स्तुति फूट पड़ी।
'तुम्हें ऐसा स्थान मिलेगा जो कभी नहीं डिगेगा,' प्रभु ने वर दिया। आज भी आकाश में ध्रुव तारा नहीं हिलता; बाकी तारे उसके चारों ओर घूमते हैं।
सार: जिसने अपमान को निश्चय में बदल दिया, वही ध्रुव है।
गजेंद्र मोक्ष: एक पुकार
त्रिकूट पर्वत के पास गजराज गजेंद्र अपने झुंड के साथ सरोवर में खेल रहा था। एक मगर ने उसका पैर पकड़ लिया। हाथी खींचता, मगर खींचता। पानी में मगर का बल ही अधिक था।
कहते हैं वह संघर्ष हज़ार वर्ष चला। झुंड चला गया। बल घट गया। तब गजेंद्र समझा — इस संसार में मुझे बचाने वाला कोई नहीं। उसने सूँड से एक कमल उठाया और पुकारा: 'जिससे यह जगत जन्मा, हे आदिमूल!'
वैकुंठ में विष्णु उठ खड़े हुए। लक्ष्मी से कहा नहीं, गरुड़ की प्रतीक्षा नहीं की — स्वयं दौड़े आए। चक्र ने मगर को चीर दिया। वह मगर शापित गंधर्व था; उसे भी मुक्ति मिली।
सार: जहाँ अपना बल चुक जाता है, वहीं शरणागति शुरू होती है।