BhaktiVed
ॐ

जे गमे जगत गुरु देव जगदीशने

prabhatiyaरचना: નરસિંહ મહેતા (Narsinh Mehta)
लिपि
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स्रोत
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स्रोत का विवरण
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जे गमे जगत गुरु देव जगदीशने, ते तणो खरखरो फोक करवो;

आपणो चिंतव्यो अर्थ कंइ नव सरे, ऊगरे एक उद्वेग धरवो. टेक

हुं करुं, हुं करुं, ए ज अज्ञानता, शकटनो भार जेम श्वान ताणे;

सृष्टि मंडाण छे सर्व एणीपेरे, जोगी जोगेश्वरा कोइक जाणे. जे.

नीपजे नरथी तो कोइ ना रहे दुःखी, शत्रु मारीने सौ मित्र राखे;

राय ने रंक कोइ, दृष्टे आवे नहि, भवनपर भवनपर छत्र दाखे. जे.

ऋतु लता पत्र फळ, फूल आपे यथा, मानवी मूर्ख मन व्यर्थ शोचे;

जेहना भाग्यमां जे समे जे लख्युं, तेहने ते समे ते ज पोहोंचे. जे.

ग्रंथ गरबड करी, वात न करी खरी, जेहने जे गमे तेने पूजे;

मन कर्म वचनथी, आप मानी लहे, सत्य छे ए ज मन एम सुझे. जे.

सूख संसारि मिथ्या करी मानजो, कृष्ण विना बीजुं सर्व काचुं;

जुगल कर जोडी करी, नरसैंयो एम कहे, जन्म प्रति जन्म हरिने ज जाचुं. जे

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