BhaktiVed
कृष्ण

भजो रे भैया राम गोविन्द हरी

कीर्तनरचना: कबीर (attributed)Kirtan; fast

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भजो रे भैया राम गोविन्द हरी।

राम गोविन्द हरी, भजो रे भैया राम गोविन्द हरी॥

जप तप साधन कछु नहिं लागत, खरचत नहिं गठरी।

भजो रे भैया राम गोविन्द हरी।

सन्तत सम्पत सुख के कारन, जासे भूल परी।

भजो रे भैया राम गोविन्द हरी।

कहत कबीर राम नहिं जा मुख, ता मुख धूल भरी।

भजो रे भैया राम गोविन्द हरी।

स्रोत: Traditional satsang kirtan attributed to Kabir; text as commonly sung