BhaktiVed
ॐ

रहीम के दोहे (चुने हुए)

దోహారచన: अब्दुर्रहीम खानखाना (Rahim)Recited between bhajans

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रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय।

टूटे से फिर ना जुड़े, जुड़े गाँठ परि जाय॥

रहिमन पानी राखिये, बिन पानी सब सून।

पानी गये न ऊबरे, मोती मानुष चून॥

तरुवर फल नहिं खात है, सरवर पियहिं न पान।

कहि रहीम पर काज हित, सम्पति सँचहि सुजान॥

बिगरी बात बनै नहीं, लाख करौ किन कोय।

रहिमन फाटे दूध को, मथे न माखन होय॥

रहिमन देखि बड़ेन को, लघु न दीजिये डारि।

जहाँ काम आवे सुई, कहा करे तरवारि॥

जो रहीम उत्तम प्रकृति, का करि सकत कुसंग।

चन्दन विष व्यापत नहीं, लिपटे रहत भुजंग॥

रहिमन निज मन की बिथा, मन ही राखो गोय।

सुनि अठिलैहैं लोग सब, बाँटि न लैहैं कोय॥

वे रहीम नर धन्य हैं, पर उपकारी अंग।

बाँटनवारे को लगे, ज्यों मेंहदी को रंग॥

रहिमन विपदा हू भली, जो थोरे दिन होय।

हित अनहित या जगत में, जानि परत सब कोय॥

खीरा सिर ते काटिये, मलियत नमक बनाय।

रहिमन करुए मुखन को, चहियत इहै सजाय॥

समय पाय फल होत है, समय पाय झरि जात।

सदा रहे नहिं एक सी, का रहीम पछितात॥

रहिमन वे नर मर चुके, जे कहुँ माँगन जाहिं।

उनते पहिले वे मुए, जिन मुख निकसत नाहिं॥

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మూలం: Rahim Dohavali; commonly recited selection