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राम

तू दयालु दीन हौं, तू दानि हौं भिखारी

भजनरचना: गोस्वामी तुलसीदास (Goswami Tulsidas)

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तू दयालु दीन हौं, तू दानि हौं भिखारी।

हौं प्रसिद्ध पातकी, तू पाप-पुंज-हारी॥

नाथ तू अनाथ को, अनाथ कौन मोसो।

मो समान आरत नहिं, आरतिहर तोसो॥

तू दयालु दीन हौं, तू दानि हौं भिखारी।

ब्रह्म तू, हौं जीव, तू है ठाकुर, हौं चेरो।

तात मात गुरु सखा, तू सब बिधि हितु मेरो॥

तू दयालु दीन हौं, तू दानि हौं भिखारी।

तोहि मोहि नाते अनेक, मानिये जो भावै।

ज्यों त्यों तुलसी कृपालु, चरन-सरन पावै॥

तू दयालु दीन हौं, तू दानि हौं भिखारी।

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स्रोत: Tulsidas, Vinay Patrika, pad 79; Gita Press edition

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