BhaktiVed
ॐ

कौन ठगवा नगरिया लूटल हो

भजनरचना: कबीर (Kabir)

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कौन ठगवा नगरिया लूटल हो।

चन्दन काठ के बनल खटोला, ता पर दुलहिन सूतल हो।

उठो री सखी मोरी माँग सँवारो, दुलहा मोसे रूठल हो॥

कौन ठगवा नगरिया लूटल हो।

आये जमराज पलँग चढ़ि बैठे, नैनन अँसुवा टूटल हो।

चार जने मिलि खाट उठाइन, चहुँ दिसि धूँ धूँ उठल हो॥

कौन ठगवा नगरिया लूटल हो।

कहत कबीर सुनो भाई साधो, जग से नाता टूटल हो।

कौन ठगवा नगरिया लूटल हो॥

स्रोत: Kabir pad (nirgun of the Banaras tradition); text as commonly sung

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