BhaktiVed
ॐ

मन मस्त हुआ तब क्यों बोले

भजनरचना: कबीर (Kabir)

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मन मस्त हुआ तब क्यों बोले।

हीरा पायो गाँठ गठियायो, बार बार वाको क्यों खोले।

मन मस्त हुआ तब क्यों बोले।

हलकी थी तब चढ़ी तराजू, पूरी भई तब क्यों तोले।

मन मस्त हुआ तब क्यों बोले।

सुरत कलारी भई मतवारी, मदवा पी गई बिन तोले।

मन मस्त हुआ तब क्यों बोले।

हंसा पाये मानसरोवर, ताल तलैया क्यों डोले।

मन मस्त हुआ तब क्यों बोले।

तेरा साहिब है घट माहीं, बाहर नैना क्यों खोले।

मन मस्त हुआ तब क्यों बोले।

कहत कबीर सुनो भाई साधो, साहिब मिल गये तिल ओले।

मन मस्त हुआ तब क्यों बोले।

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स्रोत: Kabir pad; text as commonly sung

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