BhaktiVed
ॐ

नैहरवा हमका न भावै

భజనరచన: कबीर (Kabir)

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नैहरवा हमका न भावै।

साँईं की नगरी परम अति सुन्दर, जहँ कोई जाय न आवै।

चाँद सूरज जहँ पवन न पानी, को संदेस पहुँचावै॥

नैहरवा हमका न भावै।

दरद यह साँईं को सुनावै, बिन सतगुरु आपन नहिं पावै।

साँईं के संग सखी सब आईं, काहे सोच करावै॥

नैहरवा हमका न भावै।

कहत कबीर सुनो भाई साधो, सपने में प्रीतम आवै।

तपन यह जिया की बुझि जावै, जब रतन दरस दिखावै॥

नैहरवा हमका न भावै।

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మూలం: Kabir pad; text as commonly sung

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