BhaktiVed
कृष्ण

मानुष हौं तो वही रसखानि

भजनरचना: रसखान (Raskhan)Savaiya; recited or sung slow

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मानुष हौं तो वही रसखानि, बसौं ब्रज गोकुल गाँव के ग्वारन।

जौ पसु हौं तो कहा बस मेरो, चरौं नित नन्द की धेनु मँझारन॥

पाहन हौं तो वही गिरि को, जो धर्यो कर छत्र पुरन्दर धारन।

जौ खग हौं तो बसेरो करौं, मिलि कालिन्दी कूल कदम्ब की डारन॥

या लकुटी अरु कामरिया पर, राज तिहूँ पुर को तजि डारौं।

आठहुँ सिद्धि नवौ निधि को सुख, नन्द की गाय चराय बिसारौं॥

ए रसखानि जबै इन नैनन, ते ब्रज के बन बाग तड़ागन निहारौं।

कोटिक ए कलधौत के धाम, करील के कुंजन ऊपर वारौं॥

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स्रोत: Raskhan, Sujan Raskhan (savaiya); standard text

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