BhaktiVed
कृष्ण

निसिदिन बरसत नैन हमारे

भजनरचना: सूरदास (Surdas)

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निसिदिन बरसत नैन हमारे।

सदा रहत पावस ऋतु हम पर, जब ते स्याम सिधारे॥

दृग अंजन लागत नहिं कबहूँ, उर कपोल भये कारे।

कंचुकि पट सूखत नहिं कबहूँ, उर बिच बहत पनारे॥

निसिदिन बरसत नैन हमारे।

आँसू सलिल भये पग थाके, बहे जात सित तारे।

सूरदास प्रभु यहि गति भई, बिन दरसन परम कुमारे॥

निसिदिन बरसत नैन हमारे।

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स्रोत: Surdas, Sursagar (Bhramargit); text as commonly sung

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