BhaktiVed
ॐ

उड़ जाएगा हंस अकेला

भजनरचना: कबीर (Kabir)

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उड़ जाएगा हंस अकेला, जग दर्शन का मेला।

जैसे पात गिरे तरुवर के, मिलना बहुत दुहेला।

ना जानूँ किधर गिरेगा, लग्या पवन का रेला॥

उड़ जाएगा हंस अकेला, जग दर्शन का मेला।

जब होवे उमर पूरी, जब छूटेगा हुकुम हुज़ूरी।

जम के दूत बड़े मज़बूत, जम से पड़ा झमेला॥

उड़ जाएगा हंस अकेला, जग दर्शन का मेला।

दास कबीर हरि के गुण गावै, वाह हरि को पारन पावै।

गुरु की करनी गुरु जाएगा, चेले की करनी चेला॥

उड़ जाएगा हंस अकेला, जग दर्शन का मेला।

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स्रोत: Kabir pad; text as commonly sung

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