BhaktiVed
कृष्ण

हमारे प्रभु औगुन चित न धरो

भजनरचना: सूरदास (Surdas)Vinay pad; slow

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हमारे प्रभु औगुन चित न धरो।

समदरसी है नाम तिहारो, चाहे तो पार करो॥

इक लोहा पूजा में राखत, इक घर बधिक परो।

सो दुविधा पारस नहिं जानत, कंचन करत खरो॥

हमारे प्रभु औगुन चित न धरो।

इक नदिया इक नार कहावत, मैलो नीर भरो।

जब मिलिकै दोउ एक बरन भये, सुरसरि नाम परो॥

हमारे प्रभु औगुन चित न धरो।

तन माया ज्यों ब्रह्म कहावत, सूर सु मिलि बिगरो।

कै इनकौ निरधार कीजिये, कै प्रन जात टरो॥

हमारे प्रभु औगुन चित न धरो।

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स्रोत: Surdas, Sursagar (Vinay pad); text as commonly sung

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