BhaktiVed
कृष्ण

मेरो मन अनत कहाँ सुख पावै

भजनरचना: सूरदास (Surdas)

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मेरो मन अनत कहाँ सुख पावै।

जैसे उड़ि जहाज को पंछी, फिरि जहाज पै आवै॥

कमल नयन को छाँड़ि महातम, और देव को ध्यावै।

परम गंग को छाँड़ि पियासो, दुर्मति कूप खनावै॥

मेरो मन अनत कहाँ सुख पावै।

जिहिं मधुकर अम्बुज रस चाख्यो, क्यों करील फल भावै।

सूरदास प्रभु कामधेनु तजि, छेरी कौन दुहावै॥

मेरो मन अनत कहाँ सुख पावै।

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स्रोत: Surdas, Sursagar (Vinay pad); text as commonly sung

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