BhaktiVed
Ram

Aisi Mudhta Ya Man Ki

BhajanAuthor: गोस्वामी तुलसीदास (Goswami Tulsidas)

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ऐसी मूढ़ता या मन की।

परिहरि राम-भगति-सुरसरिता, आस करत ओसकन की॥

धूम-समूह निरखि चातक ज्यों, तृषित जानि मति घन की।

नहिं तहँ सीतलता न बारि, पुनि हानि होति लोचन की॥

ऐसी मूढ़ता या मन की।

ज्यों गच-काँच बिलोकि सेन जड़, छाँह आपने तन की।

टूटत अति आतुर अहार बस, छति बिसारि आनन की॥

ऐसी मूढ़ता या मन की।

कहँ लौं कहौं कुचाल कृपानिधि, जानत हौ गति जन की।

तुलसिदास प्रभु हरहु दुसह दुख, करहु लाज निज पन की॥

ऐसी मूढ़ता या मन की।

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Source: Tulsidas, Vinay Patrika, pad 96; Gita Press edition

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