BhaktiVed
Krishna

Ses Ganes Mahes Dines

StotramAuthor: रसखान (Raskhan)

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सेस गनेस महेस दिनेस, सुरेसहु जाहि निरन्तर गावैं।

जाहि अनादि अनन्त अखण्ड, अछेद अभेद सुबेद बतावैं॥

नारद से सुक व्यास रटैं, पचि हारे तऊ पुनि पार न पावैं।

ताहि अहीर की छोहरियाँ, छछिया भरि छाछ पै नाच नचावैं॥

धूरि भरे अति सोभित स्याम जू, तैसी बनी सिर सुन्दर चोटी।

खेलत खात फिरैं अँगना, पग पैंजनी बाजति पीरी कछोटी॥

वा छबि को रसखान बिलोकत, वारत काम कला निज कोटी।

काग के भाग बड़े सजनी, हरि हाथ सों लै गयो माखन रोटी॥

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Source: Raskhan, Sujan Raskhan (savaiya); standard text

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