BhaktiVed
Krishna

Udho Mohi Braj Bisrat Nahin

BhajanAuthor: सूरदास (Surdas)

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ऊधो मोहि ब्रज बिसरत नाहीं।

हंससुता की सुन्दर कगरी, अरु कुंजन की छाहीं।

वै सुरभी वै बच्छ दोहनी, खरिक दुहावन जाहीं॥

ऊधो मोहि ब्रज बिसरत नाहीं।

ग्वाल बाल सब करत कुलाहल, नाचत गृह गृह माहीं।

यह मथुरा कंचन की नगरी, मनि मुक्ताहल जाहीं॥

ऊधो मोहि ब्रज बिसरत नाहीं।

जबहिं सुरति आवति वा सुख की, जिय उमगत तन नाहीं।

सूरदास प्रभु रहे मौन ह्वै, कहि कहि बचन सिराहीं॥

ऊधो मोहि ब्रज बिसरत नाहीं।

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Source: Surdas, Sursagar (Bhramargit); text as commonly sung

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